रानी चेन्नम्मा का इतिहास,रानी चेन्नम्मा का जन्म ,कित्तूर पर हमला,रानी चेन्नम्मा की मृत्यु,चेन्नम्मा ने अपनी वीरता का परिचय दिया

रानी चेन्नम्मा का इतिहास 

भारतीय इतिहास वीरांगनाओं से भरा पड़ा है कित्तूर की रानी चेन्नम्मा इसी में दर्ज एक स्वर्णिम नाम है वह एक महान योद्धा थी उन्होंने 1824 के आसपास अंग्रेज सरकार को अपने कौशल से धूल चटाई दो-दो बार अंग्रेजों की सेना को उनके सामने अपनी जान की भीख मांगी पड़ी थी माना जाता है कि भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाली वीरांगनाओं में उनका नाम रानी लक्ष्मीबाई से भी पहले आता है उन्होंने सबसे पहले हड़प नीति के विरुद्ध अंग्रेजों से सशस्त्र लोहा लिया था रानी चेन्नम्मा का इतिहास

रानी चेन्नम्मा का जन्म 

1778 में कर्नाटक के बेल गांव में रहने वाले गुलापा देसाई के घर एक बच्चे ने जन्म लिया था जिसका नाम चेन्नम्मा रखा गया बच्ची के माथे पर तेज और आंखों की चमक देख उसको सबका लाड़ला बना दिया मां पद्मावती तो मानो उसे एक पल के लिए भी अपनी आंखों से दूर नहीं करना चाहती थी वक्त के साथ वह बड़ी हुई तो घुड़सवारी और तलवारबाजी उनके पसंदीदा शौक बन गए थे

निरंतर अभ्यास से वह जल्दी ही युद्ध कलाओं में निपुण हो गई जिन्होंने उन्हें बाकी लड़कियों से अलग बनाया फिर वह उस उम्र में आई जिस उम्र में उस समय लड़कियों की शादी कर दी जाती थी इसके बाद इनके पिता ने भी देरी नहीं की और वह कित्तूर के राजा “मल सर्च” की पत्नी के रूप में अपना घर छोड़कर के कित्तूर राज महल में पहुंच गई

उनकी सुंदरता और सुशील व्यवहार ने उनको ससुराल में सबकी प्रिय बना दिया कभी-कभी गांव जाना होता था तो लोग उन्हें देखकर कहते थे कि हमारी चेन्नम्मा बहुत भाग्यवान है जो इतने बड़े घराने की बहू बनी कित्तूर  उन दिनों मैसूर का एक छोटा सा स्वतंत्र राज्य था परंतु वह बहुत संपन्न था वहां दूर-दूर से व्यापारी आया करते थे

क्योंकि वहां हीरे जवाहरात का बड़ा बाजार लगता था चेन्नम्मा का जीवन खुशहाल था इस दौरान उन्होंने एक पुत्र को जन्म भी दिया पर उसे किसी की नजर लग गई और जल्दी उसकी मृत्यु हो गई इसके बाद चेन्नम्मा बेहाल हो गई और दुखी रहने लगी ऐसे में पति मल सर्च उनका सहारा बने और वह धीरे-धीरे पुत्र के गम से बाहर निकलने लगी वह इस गम से उभरी ही थी कि अचानक एक दिन मल सर्च भी चल बसे

यह चेन्नम्मा के लिए दूसरा बड़ा झटका था उनकी जीने की अभिलाषा खत्म होने लगी थी खाली पन उन्हें खलने लगा था इसलिए उन्होंने खुद को राज्य के कामकाज में व्यस्त कर लिया मलसर्च के देहांत के बाद कित्तूर गद्दी पर कौन बैठेगा यह सभी के सामने एक बड़ी चुनौती थी हालांकि मल चर्च की पहली रानी “रूद्रमा” का एक पुत्र “शिवलिंग” था परंतु वह योग्य नहीं था ऐसे में चेन्नम्मा ने उसे शिक्षित कर तैयार किया और गद्दी सौंपी राज्य को इस तरह एक नया राजा मिला और कामकाज पटरी पर लौटा रानी चेन्नम्मा का इतिहास

कित्तूर पर हमला

चेन्नम्मा की चुनौतियां खत्म नहीं हुई थी की उनके दरवाजे पर दबे पांव कुछ ऐसी विपत्तियां दस्तक दे चुकी थी जिनका अंदाजा उन्हें खुद भी नहीं था उन्हें किसी ने खबर दी कि शिवलिंग नहीं रहे यह ऐसी खबर थी जिस पर चेन्नम्मा विलाप भी नहीं कर सकती थी  क्योंकि मल सर्च के जाने के बाद अंग्रेज लगातार कित्तूर पर नजर गड़ाए बैठे थे उनकी नजर कित्तूर के बेशुमार खजाने पर थी

चेन्नम्मा को इस बात का अहसास था की उन्होंने राज्य की प्रजा के लिए गम के गुटों को पी लिया है और खुद को मजबूत किया इसके बाद उन्होंने पूरी तरह से सत्ता पर अपना कब्जा जमाया और अपनी सेना को तैयार किया वह जानती थी कि किसी भी वक्त अंग्रेज उन पर हमला कर सकते हैं जैसे अंग्रेजों को पता चला कि कित्तूर कोई भी पुरुष शासक नहीं है और किसी महिला के हाथों में राज्य की बागडोर है तो उन्होंने सबसे पहले आधा राज्य देने के लालच देते हुए राज्य के कुछ लोगों को अपनी ओर मिलाया

फिर देरी ना करते हुए राज्य का खजाना लूटने के उद्देश्य से 1824 में कित्तूर पर हमला बोल दिया इसकी सूचना जब रानी चेन्नम्मा को मिली तब तक अंग्रेज किले को घेर चुके थे कित्तूर के लोगों में डर का भाव दिखा तो रानी ने अपनी जनता से कहा कि जब तक मेरी नसों में रक्त की एक भी बूंद है तब तक कित्तूर को कोई नहीं ले सकता उन्होंने सब को एक साथ आने को कहा और किले के फाटक को खोलने का आदेश दे दिया एक तरफ अंग्रेज अफसर आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दे रहा था दूसरी तरफ लोग तेजी से उन पर हावी हो रहे थे

अंत में रानी चेन्नम्मा ने दो देशद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया चेन्नम्मा का यह रूप देख कर अंग्रेज अफसर थर- थर कांप रहे थे अंग्रेज अफसर अपनी जान बचाकर वहां से भाग निकला तो उसके सिपाहियों ने रानी के सामने जान की भीख में घुटने टेक दिए रानी ने बड़ा दिल दिखाया और उन्हें जाने दिया इस हार को अंग्रेज शहर नहीं कर पा रहे थे वह किसी भी कीमत पर कित्तूर को पाना चाहते थे

इसी कड़ी में उन्होंने कुछ महीनों बाद फिर कित्तूर का किला घेर लिया परंतु इस बार भी उन्हें अपने मुंह की खानी पड़ी कित्तूर के देश भक्तों ने इस बार उनका बहुत नुकसान किया ढेर सारे अंग्रेज इस लड़ाई में मारे गए अंत में जब अंग्रेजो को लगा कि उनके पास लोग कम बचे हैं और वह नहीं जीत पाएंगे तो एक बार फिर से पीठ दिखाते हुए अपनी जान बचाकर भाग निकले 2 दिन बाद अंग्रेज फिर से एक बड़ी सेना के साथ आ गए थे

चेन्नम्मा के नेतृत्व में उन्होंने विदेशोंयो का सामना किया इस बार कमजोर पड़ गए असल में इस बार अंग्रेजी सेना की संख्या बहुत ज्यादा थी और उन्होंने धोखे से छिपकर हमला किया था इस लड़ाई में कित्तूर के ढेर सारे लोग मारे गए और रानी चेन्नम्मा अकेली पड़ गई थी लेकिन हार मानने को तैयार नहीं थी उनकी तलवार तेजी से दुश्मनों के सिर को काट रही थी अंग्रेजों को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें ऐसे में उन्होंने कित्तूर के कुछ लोगों को ढाल बनाकर धोखे से रानी को पकड़ लिया और जेल में डाल दिया गया 

रानी चेन्नम्मा की मृत्यु

21 फरवरी 1829 को रानी चेन्नम्मा वीरगति को प्राप्त हुई उनके सहयोगियों को भी फांसी दे दी गई अपने राज्य और प्रजा के लिए रानी चेन्नम्मा का योगदान अविस्मरणीय था इसलिए उनके इतने सालों के बाद भी लोग उन्हें नहीं भूले हैं

उनकी महानता आज भी कित्तूर दिखाई देती है उनकी याद में 22 -24 अक्टूबर को हर साल वहां के लोग कित्तूर उत्सव बनाकर उन्हें नमन करते हैं उन्हें बेंगलुरु राष्ट्रीय राजमार्ग पर बेलगांव के पास  कित्तूर महल तथा अन्य इमारते उन के गौरवशाली इतिहास को बयां करने के लिए आज भी मौजूद है

उनके सम्मान में उनकी प्रतिमा संसद भवन परिसर में भी लगाई गई है ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ जिस तरह से अपनी सेना के साथ रानी चेन्नम्मा ने अपनी वीरता का परिचय दिया वह उनके लिए भारतीय स्वतंत्रता अभियान की पहचान बन गया था

रानी चेन्नम्मा का इतिहास