राजा अजीत सिंह का इतिहास, राजा अजीत सिंह राठौड़ का जन्म, अजीत सिंह द्वारा षड्यंत्र , महाराजा अजीत सिंह की मृत्यु 

राजा अजीत सिंह का इतिहास 

अजीत सिंह राठौड़ जोधपुर के शासक जसवंत सिंह राठौड़ के पुत्र थे इनका जन्म होने से पहले ही इनके पिताजी की मृत्यु हो गई थी इनकी माता जी का नाम ‘जदामनी’ था एक बार जसवंत सिंह अपने सरदारों सहित पठानों का विद्रोह दबाने के लिए काबुल गए हुए थे इस विद्रोह को तो उन्होंने सफलतापूर्वक दबा दिया था परंतु इसमें महाराज जसवंत सिंह घायल हो गए थे

गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उनके प्राण नहीं छूट रहे थे इस पर उनके साथी सरदारों ने पूछा कि आपको किस बात की चिंता खाए जा रही है इस पर महाराज जसवंत ने कहा कि मेरे जाने के बाद मारवाड़ की धरती पर भयंकर आपदा आएगी या तो मेरी प्रजा मार दी जाएगी या मुसलमान बना दी जाएगी

और औरंगजेब द्वारा मारवाड़ छीन लिया जाएगा और सभी मंदिर तोड़ दिए जाएंगे यदि मेरी संतान राजगद्दी पर नहीं बैठी है तो सब कुछ आप लोगों की आंखों के सामने होगा यह सुनकर दुर्गादास राठौड़ सामने आए और उन्होंने कहा कि मैं रहूं या ना रहूं महाराज लेकिन मारवाड़ की राजगद्दी पर हमेशा आपका वंश विराजमान होगा | राजा अजीत सिंह का इतिहास |

राजा अजीत सिंह राठौड़ का जन्म

उस समय जसवंत महाराज की कोई भी संतान नहीं थी उनकी दो रानियां गर्भवती थी  1678 में जसवंत महाराज की मृत्यु हो जाती है जसवंत महाराज की मृत्यु का समाचार सुन औरंगजेब बहुत ही खुश हुआ और उसने मारवाड़ पर कब्जा कर लिया कब्जा करने के बाद उसने कहा कि मारवाड़ आज से इस्लाम का घर हो गया है

दुर्गादास यह समाचार सुनकर काबुल से तुरंत वापस लौट आए और दोनों रानियों को सुरक्षित स्थान पर ले गए कुछ समय के बाद 19 फरवरी 1679 में दोनों रानियों ने लाहौर में दो पुत्रों को जन्म दिया एक का नाम ‘अजीत सिंह’ और दूसरे का नाम ‘दलथंबल’ रखा गया परंतु कुछ समय बाद किसी बीमारी की वजह से दलथंबल की मृत्यु हो गई इसके बाद दुर्गादास अजीत सिंह को सुरक्षित सिरोही की घाटियों में ले गए और उन्हें मारवाड़ का भावी राजकुमार घोषित कर दिया

परंतु औरंगजेब को उनके ठिकाने का पता लगने पर दुर्गा दास अजीत सिंह को उनकी माता सहित मेवाड़ ले गए जहां के राजा राज सिंह नन्हे राजकुमार के मामा थे ऐसे ही एक-एक करके दुर्गादास ने 28 वर्ष बिता दिए थे उन पर कभी भी हमला हो सकता था इसलिए छापामार युद्ध नीति का फायदा उठाते थे और वह हमेशा तलवार को अपने हाथ में रखते थे

दुर्गादास ने वचन दे रखा था कि जब तक मैं मारवाड़ की धरती को औरंगजेब से आजाद ना करा लूं तब तक मेरी तलवार म्यान में नहीं जाएगी उन्होंने 30 वर्ष तक अजीत सिंह की रक्षा की थी दुर्गादास ने अजीत सिंह की रक्षा के लिए हर मुसीबत का सामना किया ताकि वह अपने वचन को पूरा कर सके 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई थी

इसके बाद 1708 में दुर्गादास ने मारवाड़ को जीतकर अपने वचन का पालन करते हुए अजित सिंह का राजतिलक किया कुछ समय बाद अजीत सिंह और दुर्गादास के बीच में किसी बात को लेकर बहस हो गई परंतु दुर्गादास राठौड़ अपने स्वाभिमान को ऊपर रखते हुए कर्म भूमि और मातृभूमि मारवाड़ को छोड़ दिया और मेवाड़ चले गए | राजा अजीत सिंह का इतिहास |

अजीत सिंह द्वारा षड्यंत्र 

मारवाड़ पर अपने शासन को मजबूत करने के बाद अजीत सिंह तेजी से साहसी हो गया क्योंकि मुगल सम्राट बहादुरशाह ने दक्षिण की ओर कदम बढ़ाया था उन्होंने आमेर के सवाई राजा जयसिंह द्वितीय के साथ गठबंधन किया और अपनी पैतृक भूमि पर कब्जा करने के लिए तैयार किया जिस पर मुगलों का कब्जा था राजपूत राजाओं ने मुगल शिविरों और चौकियों पर छापा मारा कई कस्बों और किलो पर कब्जा कर लिया

मुगलों के लिए सबसे बड़ा झटका सांभर पर कब्जा था जो एक महत्वपूर्ण नमक निर्माण स्थल था 1709 में अजीत सिंह ने अजमेर को जीतने और मुस्लिम मंदिरों और मस्जिदों को नष्ट करने की योजना बनाई जयसिंह द्वितीय को डर था कि मुस्लिम मंदिरों के विनाश से मुगल सम्राट के क्रोध का कारण बन जाएगा जब वह दक्कन से लौट आया था

अजीत सिंह ने जयसिंह की सलाह को नजरअंदाज कर दिया और राठौड़ कछवाहा गठबंधन को समाप्त करते हुए अजमेर की और अपनी सेना का नेतृत्व किया अजीत सिंह ने 19 फरवरी को अजमेर की घेराबंदी की शुरुआत खान के नेतृत्व में मुगल गैरिसन ने अजीत सिंह के साथ 45 हजार रुपए,2 घोड़े, एक हाथी और पुष्कर के पवित्र शहर को दरगाह और मस्जिदों को छोड़ने के बदले में बातचीत की इसके बाद अजित सिंह ने उनकी शर्तों को स्वीकार कर लिया और अपनी राजधानी लौट आए

जून 1710 में बहादुर शाह प्रथम ने एक बड़ी सेना के साथ अजमेर की ओर प्रस्थान किया और अजीत सिंह को अजमेर बुलाया उसमें जयसिंह द्वितीय शामिल हो गया विद्रोही अजीत सिंह को क्षमा कर दिया गया और मुगल सम्राट द्वारा औपचारिक रूप से जोधपुर के राजा के रूप में स्वीकार कर लिया गया मुगल सम्राट और गुजरात के शासन से समा प्राप्त करने के बाद भी अजीत सिंह विद्रोही बने रहे उसके खिलाफ दो बड़े अभियान भेजे गए

एक बार शायद हुसैन अली खान के अधीन और दूसरा इरादत मंद खान के अधीन 1721- 22 में अजित सिंह ने एक सेना का नेतृत्व किया और कई परगना पर कब्जा कर लिया उन्होंने नारनौल और मेवात तक मुगल क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था जो मुगल राजधानी से 16 मील दूर था इसके बाद जनवरी 1723 में उन्होंने अजमेर के मुगल गवर्नर पर हमला किया और उसे मार डाला

युद्ध के बाद 25 मुगल अधिकारियों का सिर कलम कर दिया गया और उनके सिवा और सामान को लूट लिया गया था नवंबर 1723 में सम्राट ने मारवाड़ में एक बड़ी सेना भेजी जिसने अजीत सिंह को अजमेर और 13 परगना आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया जिस पर उसने हाल ही में कब्जा कर लिया था अजीत सिंह ने अपने बेटे अभय सिंह को उपहार और पैसे के साथ मुगल राजधानी भेजा था 

महाराजा अजीत सिंह की मृत्यु 

महाराजा अजीतसिंह धर्म परायण राजा थे उन्होंने गुण सागर, दुर्गा पाठ भाषा, निर्वाण दुहा आदि ग्रंथों की रचना की थी महाराजा अजीत सिंह के लिखे हुए कई गीत आज भी मिलते हैं 23 जुलाई 1724 को महाराजा अजीत सिंह की उनके पुत्र बख्तसिंह ने हत्या कर दी थी इस हत्या में जयपुर नरेश जय सिंह तथा अजीत सिंह के बड़े पुत्र अभय सिंह का भी हाथ था महाराजा अजीत सिंह की मृत्यु के बाद 63 स्त्रियां सती हुई थी जिनमें 9 रानियां और 20 दासिया थी | राजा अजीत सिंह का इतिहास |