महावीर स्वामी का इतिहास महावीर स्वामी का जन्म मृत्यु, माता- पिता और पत्नी का नाम

महावीर स्वामी का इतिहास

महावीर स्वामी विश्व के उन महात्मा में से एक थे जिन्होंने मानवता के कल्याण के लिए राजपाठ को छोड़कर तप और त्याग का मार्ग अपनाया था बचपन में ही उनमें महानता के लक्षण दृष्टिगत होने लगे थे 30 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी ने अपना गृह त्याग कर दिया था महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे महावीर स्वामी जैन धर्म के संस्थापक भी थे महावीर स्वामी जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर थे और उनके प्रतिपादित धर्म के स्वरूप का ही पालन आज उनके भक्तों द्वारा किया जाता है| महावीर स्वामी का इतिहास

 महावीर स्वामी का जन्म

महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व में वैशाली के निकट कुंड ग्राम में हुआ था इनके बचपन का नाम “वर्धमान” था इनके पिता जी का नाम “सिद्धार्थ” और उनकी माता जी का नाम “त्रिशला” था जो कि लिछवी राजा चेतक की बहन थी 5 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी को पढ़ने के लिए गुरुकुल भेजा गया वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे लेकिन बाल्यकाल से ही वे आध्यात्मिक विषयों के बारे में सोचते रहते थे | महावीर स्वामी का इतिहास |

महावीर स्वामी द्वारा गृह त्याग 

 महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की उम्र में अपने बड़े भाई नंदी वर्धन तथा राज्य के प्रमुख व्यक्तियों से आज्ञा लेकर गृह त्याग किया था और अपनी शिविका में बैठकर धूमधाम से सेना तथा सवारी के साथ कुंड ग्राम के बीच होते हुए एक बगीचे में पहुंचकर अशोक वृक्ष के नीचे रुके और अपने सभी आभूषण उतार कर ढाई दिन तक उपवास किया और अपने बाल नोच कर के भिक्षु बन गए महावीर स्वामी सबसे पहले कुम्हार गांव में पहुंचे और वही पर  तप शुरू किया और आरंभ में 13 महीनों तक वस्त्र पहनते रहे बाद में वस्त्रों को  “सुवर्ण बालूका नदी” में फेंक दिए इसके बाद महावीर स्वामी हाथ में  भिक्षा पात्र लेकर  नगन अवस्था में घूमने लगे और इस प्रकार उन्होंने अपनी कठोर तपस्या प्रारंभ की थी महावीर स्वामी 6 वर्ष बाद नालंदा गए और वहां पर उनकी मुलाकात मक्खलि गोसाल नामक सन्यासी से हुई और कोलाग के पास पणित भूमि नामक स्थान पर दोनों ने कठोर तप किया परंतु कुछ समय बाद दोनों के मध्य मतभेद हो गए तथा एक दूसरे के आलोचक बन गए|महावीर स्वामी का इतिहास 

महावीर स्वामी को ” कैवल्य” की प्राप्ति 

मक्खलि गोसाल  ने एक संप्रदाय की स्थापना की जो आगे चलकर आजीविक- संप्रदाय के नाम से विख्यात हुआ और इसका केंद्र श्रावस्ती में था महावीर स्वामी ने 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की और इस कारण उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि छोटे-छोटे कीटाणु उनके शरीर पर रेंगने लगे और 13 वे वर्ष उन्हें  वैशाख शुक्ल दशमी को ऋजुपालिका नदी के किनारे साल वृक्ष के नीचे उन्हें “कैवल्य ज्ञान’  की प्राप्ति हुई और तभी से महावीर स्वामी निरग्रंथ कहलाए महावीर स्वामी ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश राजगीर में विपुलाचल पहाड़ी पर वाराकर नदी के किनारे प्राकृत भाषा में दिया |महावीर स्वामी का इतिहास

महावीर स्वामी के शिष्य

महावीर स्वामी के प्रथम शिष्य तथा प्रथम विरोधी उनके दामाद जामिल बने और विशाली के राजा चेतक जो महावीर स्वामी के मामा थे वह शिष्य बने और चंपा नगर के राजा  दद्दीवाहन  भी  शिष्य बने तथा उनकी पुत्री चंपा भी महावीर स्वामी की शिष्या बनी जो प्रथम भिक्षुणी थी महावीर स्वामी ने पावा में सबसे पहले 11 ब्राह्मणों को उनके शिष्यों सहित जैन धर्म ग्रहण करवाया और सभी को 11 समूहो में बांट दिया तथा प्रत्येक गण में एक गणधर नियुक्त किया गया महावीर स्वामी का संघ चार कोटीयों में विभक्त था भिक्षु,भिक्षुणी , श्रावक, श्राविका प्रथम दो कोटिया जैन साधुओं के लिए तथा शेष दो कोटिया गृहस्थ उपासकों के लिए है |महावीर स्वामी का इतिहास

महावीर स्वामी का विवाह

महावीर स्वामी का विवाह यशोदा से हुआ था और यशोदा के ही गर्भ से उन्हें पुत्री प्रियदर्शनी उत्पन्न हुई जिनका विवाह  जामिल नामक व्यक्ति से हुआ था |महावीर स्वामी का इतिहास

जैन धर्म के सिद्धांत 

जैन धर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है, जैन धर्म में आत्मा की मान्यता है, जैन धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करता है ,जैन धर्म कर्म वाद में विश्वास  करता है जैन धर्म के पंच महाव्रत है–  अहिंसा- मन वचन तथा कर्म किसी भी प्रकार से इंसान नहीं करनी चाहिए, मनुष्य को हमेशा सत्ता मधुर बोलना चाहिए, बिना अनुमति के किसी भी वस्तु को ग्रहण नहीं करना चाहिए और ना ही इच्छा करनी चाहिए ,किसी भी प्रकार की संपत्ति एकत्रित नहीं करनी चाहिए ,किसी भी महिला को देखना या वार्तालाप नहीं करना चाहिएजैन धर्म के त्रिरत्न है- सम्यक दर्शन- किसी भी वस्तु या महिला को वास्तविक रूप में देखना ही सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान-  सच्चा और पूर्ण ज्ञान, सम्यक आचरण- दैनिक जीवन में नैतिक आचरण रखना |महावीर स्वामी का इतिहास

महावीर स्वामी की मृत्यु 

विश्व बंधुत्व और समानता का आलोक फैलाने वाले महावीर स्वामी  72 वर्ष की आयु में पावापुरी बिहार में कार्तिक कृष्णा दीपावली से 1 दिन पहले मृत्यु को प्राप्त हुए थे महावीर स्वामी के कारण ही 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों ने एक विशाल धर्म का रूप धारण किया जिन भगवान के अनुयाई जैन कहलाते थे और उनकी मान्यता के अनुसार जैन धर्म अनादि काल से चला आ रहा है इसका प्रचार करने के लिए समय-समय पर तीर्थकरो का जन्म होता  रहा है जैन धर्म में अहिंसा तथा कर्मों की पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता है उनका तीसरा मुख्य सिद्धांत अनेकांतवाद है जिसके अनुसार दूसरों के दृष्टिकोण को समझकर ही पूर्ण सत्य के निकट पहुंचा जा सकता है |महावीर स्वामी का इतिहास