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 महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का इतिहास

 महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का इतिहास, महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का जन्म, दौराई का युद्ध , पोकरण का विवाद, जसवंत सिंह राठौड़ की मृत्यु 

महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का इतिहास

 महाराजा गज सिंह के 2 पुत्र थे अमर सिंह और जसवंत सिंह महाराजा गज सिंह अपने छोटे पुत्र जसवंत सिंह को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे जबकि अमर सिंह जेठ पुत्र थे क्योंकि अमर सिंह का स्वभाव बहुत ही विद्रोही था और जसवंत का स्वभाव शीतल था एक बार जब सभी लोग खाना खाने बैठे हुए थे तब वहां पर जसवंत के जीजा भी थे यानी की बहन के पति जब वह खाना खा रहे थे तब उनके मुंह से खाने की आवाज निकल रही थी उस आवाज को सुनकर अमर सिंह बहुत ही क्रोधित हुए और उन्होंने कहा कि आप खाने को अच्छी तरह से खा लीजिए

जब उन्होंने फिर से खाना शुरू किया तब भी उनके मुंह से खाने की आवाज आ रही थी क्योंकि उन्होंने अमर सिंह की बातों पर ध्यान नहीं दिया और उसे मजाक समझ कर टाल दिया इसके बाद अमर सिंह ने क्रोध में हो कर अपनी म्यान से तलवार निकाली और उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी अमर सिंह ने अपनी ही बहन को विधवा बना दिया था उनके इसी स्वभाव के कारण ही गजसिंह उन्हें उत्तराधिकारी नहीं बनाना चाहते थे |  महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का इतिहास |

महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का जन्म

महाराजा जसवंत सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1626 ईस्वी में बुरहानपुर में हुआ था जब इनके पिताजी की मृत्यु हुई उस समय जसवंत सिंह विवाह के लिए बूंदी गए हुए थे जब इनके पास इनके पिता के मृत्यु का समाचार पहुंचा तब यह तुरंत वापिस जोधपुर आ गए थे जोधपुर आने के बाद दिल्ली के सम्राट शाहजहां ने इनका 6 मई 1638 को राज्याभिषेक किया और इन्हें “महाराजा” की उपाधि दी थी

उस समय दिल्ली के सम्राट शाहजहां के पुत्रों में उत्तराधिकारी को लेकर संघर्ष चल रहा था जब 1658 में धरमत का युद्ध हुआ तब इस युद्ध में जसवंत ने दाराशिकोह का साथ दिया था युद्ध करते समय जसवंत सिंह इस युद्ध में घायल हो गए थे और उन्हें घायल अवस्था में ही जोधपुर ले जाया गया था इस युद्ध में औरंगजेब की विजय हुई और दारा शिकोह की हार हुई थी

औरंगजेब ने इस युद्ध में अपने दो भाइयों को मौत के घाट उतार दिया था जब जसवंत राठौर घायल अवस्था में अपने किले के बाहर पहुंचे तब इन्होंने दरवाजा खोलने के लिए कहा तब इनकी रानी हाड़ी रानी दे ने दरवाजा खोलने से इंकार कर दिया था इनकी रानी ने कहा कि राजपूत अपना सिर कटा सकते हैं परंतु युद्ध स्थल से खाली हाथ वापस नहीं आते

इसके बाद इनकी रानी को जसवंत सिंह की माता समझाती है कि जब यह अगले युद्ध में जाएंगे तब इसका बदला जरूर ले लेंगे यह सुनने के बाद दिन की रानी किले के दरवाजे खोल देती है अंदर आने के बाद जब जसवंत सिंह खाना खाने के लिए बैठते हैं तब इन्हें सोने चांदी के बर्तनों की बजाय लकड़ी के बर्तनों में खाना दिया जाता है धरमत की लड़ाई को जीतने के बाद औरंगजेब इस लड़ाई को ‘फतेहाबाद’ नाम दे देता है |  महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का इतिहास |

दौराई का युद्ध 

यह युद्ध 11 मार्च से लेकर 15 मार्च 1651 तक हुआ था यह युद्ध आमेर जिले में लड़ा गया था उस समय आमेर के शासक जयसिंह थे वह औरंगजेब का साथ दे रहे थे इसके बाद औरंगजेब ने जयसिंह के हाथों जसवंत को पैगाम भिजवाया कि वह दारा शिकोह का साथ छोड़ कर मेरा साथ दे तब जसवंत ने जयसिंह को कहा कि मैं केवल मुगल दरबार का सेवक हूं तुम्हारा नहीं हूं

जो मुगल दरबार में शासक रहेगा मैं उसी का सेवक रहूंगा जब दारा शिकोह और औरंगजेब के बीच दौराई का युद्ध होता है तब इस युद्ध में औरंगजेब की जीत होती है दिल्ली का शासक बनने के बाद औरंगजेब जसवंत सिंह राठौड़ को अलग-अलग अभियानों पर भेज देता था एक बार औरंगजेब ने जसवंत सिंह राठौड़ को अफगानिस्तान पिंडारीयों के विरुद्ध भेज दिया |  महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का इतिहास |

पोकरण का विवाद

जैसलमेर के रावल मनोहर दास के निसंतान मरने पर रामचंद्र गद्दी पर बैठा यह कार्य रघुनाथ की अनुपस्थिति में हुआ था इस समय भाटी सबल सिंह, राव रूप सिंह, भारमल और कछवाहा के यहां नौकरी करता था और बादशाह शाहजहां की रूपसिंह पर बड़ी कृपा थी उसने सबल सिंह के वास्ते बादशाह से जैसलमेर राज्य दिलाना स्वीकार करवा लिया

इसी अवसर पर महाराजा जसवंत सिंह ने बादशाह से निवेदन कर पोकरण पर अधिकार करने का फरमान लिखा लिया कुछ दिनों बाद शाहजहां ने सबल सिंह के नाम जैसलमेर का फरमान नाम कर दिया उधर जसवंत सिंह ने सेना भेजकर पोकरण गढ़ पर अधिकार कर लिया पोकरण पर अधिकार करने के बाद जोधपुर सेना जैसलमेर गई और सबल सिंह को वहां सिहासन पर बैठा कर वापस लौट आई |  महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का इतिहास |

जसवंत सिंह राठौड़ की मृत्यु 

28 दिसंबर 1678 को जसवंत सिंह राठौड़ की अफगानिस्तान के ‘जमरूद’ स्थान पर मृत्यु हो जाती है जसवंत की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने कहा कि आज से मारवाड़ इस्लाम का घर हो गया है जसवंत की मृत्यु के समय उनकी दो रानियां गर्भवती थी जसवंत महाराज की मृत्यु का समाचार सुन करऔरंगजेब बहुत ही खुश हुआ और उसने मारवाड़ पर कब्जा कर लिया

कब्जा करने के बाद जसवंत सिंह का एक सलाहकार था दुर्गादास राठौड़ वह बहुत ही प्रतापी सेनापति थे दुर्गादास यह समाचार सुनकर काबुल से तुरंत वापस लौट आए और दोनों रानियों को सुरक्षित स्थान पर ले गए कुछ समय बाद दोनों रानियों ने दो पुत्रों को जन्म दिया एक का नाम ‘अजीत सिंह’ और दूसरे का नाम ‘दलथंबल’ रखा गया परंतु कुछ समय बाद किसी बीमारी की वजह से दलथंबल की मृत्यु हो गई

इसके बाद दुर्गादास अजीत सिंह को सुरक्षित सिरोही की घाटियों में ले गए और उन्हें मारवाड़ का भावी राजकुमार घोषित कर दिया परंतु औरंगजेब को उनके ठिकाने का पता लगने पर दुर्गादास अजीत सिंह को उनकी माता सहित मेवाड़ ले गए जहां के राजा राज सिंह नन्हे राजकुमार के मामा थे ऐसे ही एक-एक करके दुर्गादास ने 28 वर्ष बिता दिए थे उन पर कभी भी हमला हो सकता था इसलिए छापामार युद्ध नीति का फायदा उठाते थे और वह हमेशा तलवार को अपने हाथ में रखते थे

जसवंत की मृत्यु के समय दुर्गादास राठौड़ ने उन्हें वचन दिया था कि मारवाड़ की राजगद्दी पर हमेशा आपका वंश विराजमान होगा जसवंत की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अजीत सिंह को मारवाड़ की राजगद्दी सौंपी गई थी जसवंत सिंह राठौड़ की “रानी जसवंतदे” ने राईकाबाग और कल्पान सागर नामक तालाब का निर्माण करवाया था |  महाराज जसवंत सिंह राठौड़ का इतिहास |