कालिंजर किले का इतिहास, कालिंजर किले का निर्माण, कालिंजर किले का रानी महल, कालिंजर किले की विशेषता , कालिंजर किले पर आक्रमण

कालिंजर किले का निर्माण

 कालिंजर का किला मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड जिले के बांदा मे स्थित है यह किला विश्व धरोहर खजुराहो के पास स्थित है कलिंजर का किला भारत का अजयत का किला माना जाता है क्योंकि आज तक कोई भी व्यक्ति इस किले पर विजय प्राप्त नहीं कर पाया था

समुंद्र मंथन के दौरान हलाहल विष निकला था जिसे भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया था माना जाता है कि इसी स्थान पर भगवान शिव ने अपने उसी विष को तपस्या करके शांत किया था विष को गले में धारण करने के कारण भगवान शिव को नीलकंठ के नाम से जाना जाता है इस किले में नीलकंठ का एक भव्य मंदिर भी स्थापित है

कलिंजर में ही भगवान शिव ने काल पर विजय प्राप्त की थी जिस कारण इस स्थान का नाम कालिंजर पड़ा था कालिंजर किले का निर्माण चंदेल शासकों ने किया था इसके बाद यह किला “रीवा के सोलंकी” साम्राज्य के अधीन हो गया था इस किले पर “मोहम्मद गजनबी, कुतुबुद्दीन ऐबक ,हुमायूं ,और शेरशाह सूरी” जैसे महान योद्धाओं ने आक्रमण करके इस किले को जीतने की कोशिश की थी परंतु वह सभी असफल रहे थे

कलिंजर युद्ध के समय तोप का गोला लगने से शेर शाह सुरी कि यहां पर मृत्यु हो गई थी इसके बाद अकबर ने इस किले पर अपना अधिकार कर लिया और बीरबल को इसे तोहफे में दे दिया था इस किले में कई प्राचीन मंदिर स्थापित है जो गुप्त काल के हैं विद्यांचल पहाड़ी पर 700 फीट ऊंचा बना यह किला इतना सुंदर प्रतीत होता है, जितना यह है नहीं यह किला दिन के समय बहुत ही शांत रहता है लेकिन रात के समय बहुत हलचल पैदा करता है यहां पर आसपास के लोग बताते हैं कि रात के समय इस किले से रानी के घुंघरू की आवाज सुनाई देती है जिसे सुनकर लोग भयभीत हो जाते हैं | कालिंजर किले का इतिहास |

कालिंजर किले का रानी महल 

कालिंजर किले में मौजूद रानी महल का प्रवेश द्वार आयताकार का बना हुआ है 1500 साल पहले रानी महल में महफिले सजा करती थी इसी महल के अंदर एक पद्मावती नाम की नृतिका का नाचा करती थी वह बहुत ही सुंदर थी जो भी व्यक्ति उसे एक बार देख लेता था उस पर मोहित हो जाता था जब पद्मावती नृत्य करती थी तो चंदेल वंश के शासक ने मंदबुद्धि खो बैठते थे

जो भी व्यक्ति पद्मावती के घुंघरू की आवाज सुनता था उसकी बुद्धि की शक्ति खत्म हो जाती थी पद्मावती भगवान शिव की भगत थी और किले में स्थित नीलकंठ मंदिर में वह प्रतिदिन जलाभिषेक करती थी इस जल से निरंतर शिवलिंग का जलाभिषेक होता रहता है नीलकंठ मंदिर के ऊपर एक प्राकृतिक जल स्त्रोत है जो कभी नहीं सूखता है यहां पर आसपास के लोग बताते हैं कि जब पूर्णिमा की रात आती है तब पद्मावती के घुंघरू की आवाज सुनाई देती है 

कालिंजर किले की विशेषता 

कालिंजर किले में 7 प्रवेश द्वार थे वर्तमान समय में केवल 3 ही प्रवेश द्वार बचे हुए हैं यहां के स्तंभ और दीवारों में कई प्रतिलिपिया बनी हुई है माना जाता है कि इन प्रतिलिपियो में यहां पर मौजूद खजाने का रहस्य छुपा हुआ है जिसे अब तक कोई भी ढूंढ नहीं पाया है इस किले में एक सीता सेज नाम की छोटी सी गुफा है जहां एक पत्थर का पलंग और तकिया रखा हुआ है माना जाता है कि यह स्थान माता सीता का विश्राम स्थली था

इस किले में बुड्ढा और बुड्ढी नाम का एक तालाब है जो औषधीय गुणों से भरपूर हैं माना जाता है कि इस तालाब का जल है चर्म रोग के लिए लाभदायक है इस तालाब में स्नान करने से कुष्ठ रोग भी दूर हो जाता है कलिंजर के मुख्य आकर्षणों में नीलकंठ मंदिर,इसे चंदेल शासक “परमादित्य देव” ने बनवाया था मंदिर में 18 भुजा वाली विशालकाय प्रतिमा के अलावा रखा

शिवलिंग नीले पत्थर का है मंदिर के रास्ते पर भगवान शिव, काल भैरव, गणेश और हनुमान की प्रतिमाएं पत्थरों पर उकेरी गई है कालिंजर दुर्ग की कुल ऊंचाई 108 फीट हैइसकी दीवारें चौड़ी और ऊंची है इसकी तुलना चीन की दीवार से की जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कालिंजर दुर्ग को मध्यकालीन भारत का सर्वोत्तम दुर्ग माना जाता है

इस दुर्ग में स्थापत्य की कई शैलियां दिखाई देती है जैसे गुप्त शैली, प्रतिहार शैली, पंचायतन नागर शैली आदि किले के बीचो बीच अजय पाल का नाम एक झील है जिसके आसपास कई प्राचीन काल के मंदिर निर्मित हैं यहां ऐसे तीन मंदिर है, जिन्हें अंकगणितीय विधि से बनाया गया है | कालिंजर किले का इतिहास |

कालिंजर किले पर आक्रमण

इस किले की सेना ने कन्नौज नरेश जयपाल की सेनाओं के साथ सन 978 ईसवी में गजनी के सुल्तान पर आक्रमण किया और उसे परास्त किया था जिसका बदला लेने के लिए महमूद गजनवी की सेना ने सन 1023 ईस्वी में कालिंजर पर आक्रमण किया था और वह असफल रहा था हुमायूं की मृत्यु के बाद 1544ईस्वी में शेरशाह सूरी दिल्ली सल्तनत के शासक बने

दिल्ली का शासक बनने के बाद शेर शाह सुरी ने अपने अंतिम चढ़ाई कालिंजर की थी जब रीवा के शासक ने भागकर कालिंजर में शरण ली थी जब शेर शाह सुरी ने शासक को वापस मांगा तब कालिंजर के राजा कीर्ति सिंह ने उसे वापस देने से इंकार कर दिया इसके बाद शेरशाह सूरी ने हमले की घोषणा कर दी थी उसकी सेना ने राजपूत किले की दीवार पर घेरा डालने वालों पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया था

कालिंजर किले को अफगानी भी नहीं भेज पाए थे क्योंकि इस किले की ऊंची पहाड़ियों पर बनी बहुत ही मजबूत दीवारें थी इन मजबूत दीवारों को तोड़ने के लिए शेर शाह सुरी ने बारूद के गोलों का इस्तेमाल किया अपनी साल भर मेहनत को व्यर्थ जाता देख शेरशाह सूरी ने किले पर गोले दागने का आदेश दिया था अगली सुबह जब शेर शाह सुरी ने  स्वयं दीवार पर गोला चलाया तब वह दीवार से टकराकर वापस आ गया और बारूद के ढेर से टकराकर विस्फोट हो गया जिसकी लपटें शेरशाह सूरी तक पहुंची और वह उस आग में झुलस गया

आग से जल जाने के कुछ समय बाद ही शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई थी अंत में अकबर ने 1569 ईसवी में यह किला जीतकर बीरबल को उपहार स्वरूप दे दिया था बीरबल के बाद यह किला बुंदेल राजा छत्रसाल के अधीन हो गया इसके बाद किले पर पन्ना के हरदेव साहब का कब्जा हो गया 1812 ईस्वी में यह किला अंग्रेजों के अधीन हो गया था | कालिंजर किले का इतिहास |