चिंतपूर्णी मां का इतिहास , पौराणिक कथा , चिंतपूर्णी मां का मंदिर, चिंतपूर्णी मंदिर कहाँ है, 

चिंतपूर्णी मां का इतिहास 

चिंतपूर्णी मां का धाम हिमाचल प्रदेश में स्थित है यह स्थान हिंदुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है यह 51 शक्तिपीठों में से एक है हिमाचल की ज्वाला देवी विद्यांचल की विद्यावासिनी और सराहना पुर की शाकंभरी देवी की भांति है यह भी एक सिद्ध स्थान है यहां पर माता सती के चरण गिरे थे इस स्थान पर प्रकृति का सुंदर नजारा देखने को मिल जाता है

यात्रा मार्ग में काफी सारे मनमोहक दृश्य है जो यात्रियों को मन मोह लेते हैं और उन पर एक अमिट छाप छोड़ देते हैं यहां पर आकर माता के भक्तों को आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति होती है वर्तमान में उत्तर भारत की नौ देवी यात्रा में चिंतपूर्णी का पांचवा दर्शन होता है

वैष्णो देवी से शुरू होने वाली नौ देवी यात्रा में मां चामुंडा देवी, मां बृजेश्वरी देवी, मां ज्वाला देवी, मां चिंतपूर्णी देवी, मां नैना देवी ,मां मनसा देवी, मां कालिका देवी, मां शाकंभरी देवी सहारनपुर आदि शामिल है देवी सप्तशती के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच में 100 वर्षों तक युद्ध चला था जिसमें असुरों की विजय हुई थी असुरों का राजा महिषासुर स्वर्ग का राजा बन गया और देवता सामान्य मनुष्यों की तरह धरती पर विचरण करने लगे थे

देवताओं के ऊपर असुरों द्वारा बहुत अत्याचार किया गया देवताओ ने इस विषय पर आपस में विचार किया और इस कष्ट के निवारण के लिए वह भगवान विष्णु के पास गए भगवान विष्णु ने उन्हें देवी की आराधना करने को कहा तब देवता ने उनसे पूछा कि वह कौन देवी है जो हमारे कष्टों का निवारण करेगी इसी योजना के फल स्वरुप त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के अंदर से एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ जो देखते ही देखते एक स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गया था

इसके बाद इस देवी को सभी देवी देवताओं ने कुछ ना कुछ भेंट स्वरूप प्रदान किया भगवान शंकर ने सिंह, भगवान विष्णु ने कमल, इंदर ने घंटा, समुंदर ने कभी न मेली होने वाली माला प्रदान की इसके बाद सभी देवताओं ने देवी की आराधना की ताकि देवी प्रसन्न हो और उनके कष्टों का निवारण हो सके और इसके बाद देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं को वरदान दिया और कहा मैं तुम्हारी रक्षा अवश्य करूंगी इसी के फलस्वरूप देवी ने महिषासुर के साथ युद्ध प्रारंभ कर दिया जिसमें देवी की विजय हुई और तभी से देवी का नाम महिषासुर मर्दिनी पड़ गया 

पौराणिक कथा 

चिंतपूर्णी मंदिर शक्तिपीठ मंदिरों में से एक है पूरे भारतवर्ष में कुल 51 शक्तिपीठ है इन सभी की उत्पत्ति कथा एक ही है यह सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुए हैं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इन सभी स्थलों पर देवी के अंग गिरे थे एक बार शिव के ससुर राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उन्होंने शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया क्योंकि वह शिव को अपने बराबर का नहीं समझते थे

यह बात सती को काफी बुरी लगी वह बिना बुलाए यज्ञ में पहुंच गई जहां शिव का काफी अपमान किया गया इस अपमान को सती सहन न कर सकी और वह हवन कुंड में कूद गई जब भगवान शंकर को यह बात पता चली तो वे दौड़े चले आए और सती के शरीर को हवन कुंड से निकालकर तांडव करने लगे जिस कारण सारे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया

पूरे ब्रह्मांड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर के अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागों में बांट दिया जो अंग जहां पर गिरा वह शक्तिपीठ बन गया कोलकाता में केस गिरने के कारण महाकाली, नगर कोट में स्तनों का कुछ भाग गिरने से बृजेश्वरी, ज्वालामुखी में जीवा गिरने से ज्वाला देवी, हरियाणा के पंचकुला के पास मस्तिष्क का अग्रिम भाग गिरने के कारण मनसा देवी,

कुरुक्षेत्र में टकना गिरने के कारण भद्रकाली, सहारनपुर के पास शिवालिक पर्वत पर शीश गिरने के कारण शाकंभरी देवी, कराची के पास ब्रह्मरंध्र गिरने से माता हिंगलाज भवानी, आसाम में कोख गिरने से कामाख्या देवी, नयन गिरने से नैना देवी आदि शक्ति पीठ बन गए चिंतपूर्णी में माता सती के चरण गिरे थे इन्हें “छिन्नमस्तिका” देवी भी कहा जाता है चिंतपूर्णी देवी मंदिर के चारों और भगवान शंकर के मंदिर हैं 

चिंतपूर्णी मां का मंदिर 

माई दास नाम के दुर्गा माता के श्रद्धालु भगत ने इस स्थान की खोज की थी यह बात 1556 से 1700 के आसपास की है माई दास के पिता का  गांव के रहने वाले थे जो कि उस समय पटियाला रियासत में था वह बड़े तेजस्वी दुर्गा भगत थे उनके 3 पुत्र थे देवीदास, दुर्गादास और सबसे छोटे माईदास उस समय मुगलों का अत्याचार जोरों पर था

माई दास के पिता उनके अत्याचारों से बहुत दुखी होकर अठारह को छोड़कर जो गुना जिले आकर बस गए अपने पिता की तरह ही माई दास का ज्यादातर समय देवी की पूजा पाठ में बीतता था इस कारण वह अपने दोनों बड़े भाइयों के साथ व्यापार आदि कामकाज में पूरा समय नहीं दे पाते थे कुछ समय के बाद उनके पिता देहांत हो गया

उनके पिता की मृत्यु के बाद किसी बात को लेकर उनके भाइयों ने उन्हें घर से अलग कर दिया लेकिन माई दास ने फिर भी अपनी दिनचर्या और भक्ति में कोई कमी नहीं आने दी एक बार अपने ससुराल जाते समय माई दास जी रास्ते मे घने जंगल में बरगद के पेड़ के नीचे आराम करने बैठ गए संयोगवश माई दास जी की आंख लग गई और सपने में उन्हें दिव्य तेज से युक्त एक कन्या दिखाई थी जिसने उन्हें आदेश दिया तुम जहां आराम कर रहे हो वही में इस वटवृक्ष के नीचे निवास करती हूं तुम इसी स्थान पर रहकर मेरी सेवा करो इसी में तुम्हारा भला है

ससुराल से वापस आते समय माई दास जी के कदम फिर यहां ठिठक गए फिर उसी वट वृक्ष की छाया में बैठ गए उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की यदि मैंने शुद्ध हृदय से आप की उपासना की है तो प्रत्यक्ष दर्शन देकर मुझे आदेश दें जिससे मेरी शंका दूर हो बार-बार स्तुति करने पर उन्हें भी वाहिनी मां दुर्गा के चतुर्भुज रूप में साक्षात दर्शन हुए देवी ने कहा मैं इस वृक्ष के नीचे चिरकाल से विराजमान हूं लोभ यवनों के आक्रमण और अत्याचारों के कारण मुझे भूल गए हैं मैं इस पेड़ के नीचे पिंडी रूप में विराजित हूं

तुम मेरे परम भक्त हो इसलिए यहां रहकर मेरी आराधना और सेवा करो मैं ‘छिन्नमस्तिका’ के नाम से पुकारी जाती हूं तुम्हारी चिंता दूर करने के कारण अब मैं यहां “चिंतापूर्णी” के नाम से प्रसिद्ध हो जाऊंगी माई दास जी ने नतमस्तक होकर निवेदन किया मैं एक निर्जीव हूं इस भयानक जंगल में मैं अकेला किस प्रकार रहूंगा ना यहां पानी है, ना रोटी है, ना ही कोई स्थान बना हुआ है, जंगली जानवरों के भय से यहां तो दिन में ही डर लगता है, रात कैसे कटेगी

इसके बाद माता ने कहा यह स्थान मेरा शक्ति पीठ है यहां सती के रूप में मेरा मस्तक गिरा था फिर रक्तबीज नाम के महासुर का वध करके मैंने अपनी योगिनी जया और विजया को यही अपना मस्तक काटकर अपना रक्त पिलाया था तभी से मैं यहां विराजमान हूं मैं तुमको निर्भय दान देती हूं तुम यहीं रहकर मेरी सेवा करो मेरे चमत्कारों से यहां बहुत भगत आएंगे जिन भक्तों की मैं चिंता दूर करूंगी वह स्वयं ही मेरा मंदिर बनवा देंगे, जो चढ़ावा चढ़ेगा उससे तुम्हारा गुजारा होगा

तुम्हारे बाद तुम्हारे वंशज ही मेरी सेवा पूजा करेंगे तुम चिंता ना करो यह जंगली जानवर तुमको कुछ नहीं कहेंगे और रही पानी की बात तो यहां से कुछ ही कदम की दूरी पर एक पत्थर रखा हुआ है उस पत्थर को  हटाने पर पानी भी आ जाएगा तुमको सेवा पूजा में कोई भी समस्या होगी तो मैं कन्या रूप में आकर तुम्हें बता दूंगी ऐसा कहकर माता पिंडी के रूप में अंतर्ध्यान हो गई

इसके बाद माई दास की चिंता का निवारण हुआ वह खुश होकर पहाड़ी से थोड़ा नीचे उतरे और एक बड़ा पत्थर हटाया तो काफी मात्रा में जल निकल आया माई दास की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा उन्होंने वही अपनी झोपड़ी बना ली और उस जल से नित्य नियम पूर्वक पिंडी की पूजा करनी प्रारंभ कर दी आज भी वह बड़ा पत्थर जिसे माई दास जी ने हटाया था

वह चिंतापूर्णी मंदिर में रखा हुआ है जहां से जल निकला था वह अब सुंदर तालाब बनवा दिया गया है इस स्थान से जल लाकर माता जी का अभिषेक किया जाता है उसी दिन से मां चिंतपूर्णी की सेवा माई दास जी के वंशज जो कि भारद्वाज गोत्र सारस्वत ब्राह्मण के हैं वे ही सेवा करते हैं मां का मंदिर आज भी उसी दिव्य वटवृक्ष के नीचे बना हुआ है मान्यता है कि उस वट वृक्ष पर कोई भी मन्नत मांग कर मौली बांधी जाती है तो वह मन्नत जल्दी ही पूरी होती है 

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