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चंदबरदाई का जन्म 

भारत के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के मित्र तथा राजकवि और हिंदी के आदि महाकवि चंदबरदाई का जन्म 1148 ईस्वी को एक ब्राह्मण परिवार के लाहौर में हुआ था इनके पिता का नाम राव वेन था इनके पिता अजमेर के चौहानों के पुरोहित थे इसी से चंद को पिता के साथ राजकुल के संपर्क में आने का अवसर मिला बाल्यकाल से यह प्रतिभाशाली सिद्ध हुए और शीघ्र ही इन्होंने भाषा, साहित्य, व्याकरण, छंद, पुराण आदि का ज्ञान प्राप्त कर लिया

यह हिंदी के प्रथम महा कवि माने जाते हैं चंदबरदाई  पृथ्वीराज  के पिता सोमेश्वर के समय में राजपूताने आए थे बाद में वह अजमेर दिल्ली के सुविख्यात हिंदू नरेश पृथ्वीराज का सम्माननीय राजकवि और सहयोगी हो गया था इनका अधिकांश जीवन महाराजा पृथ्वीराज चौहान के साथ दिल्ली में बीता था वह राजधानी और युद्ध क्षेत्र सब जगह पृथ्वीराज के साथ रहा करते थे चंदबरदाई पृथ्वीराज के राज कवि ही नहीं उनके मित्र और सामंत भी थे तथा भाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंद शास्त्र, ज्योतिष ,पुराण, नाटक आदि अनेक विधाओं में पारंगत थे

चंदबरदाई की तुलना अंग्रेजी भाषा के कवि जेफ्री चौसर से करते हुए मित्र बंधुओं ने लिखा है इन दोनों की रचनाएं परम मनोहर थी और वर्तमान समय के मनुष्य बिना विशेष पर्यटन के इनकी भाषा समझ नहीं सकते इन दोनों की रचनाएं समान है चौसर को जैसे अंग्रेज लोग अंग्रेजी कविता का पिता समझते हैं वैसे ही चंदबरदाई भी हिंदी का जन्मदाता कहा जा सकता है | चंदबरदाई का जीवन परिचय |

चंदबरदाई की रचना

 पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई की  प्रसिद्ध रचना है पृथ्वीराज रासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य कहलाता है इनकी भाषा को भाषा शास्त्रियों ने पिंगल का है जो राजस्थान में ब्रजभाषा का पर्याय है रासो की रचना महाराज पृथ्वीराज के युद्ध वर्णन के लिए हुई है इसमें अनेक वीरता पूर्ण युद्ध और  प्रेम प्रसंगों का कथन है इस ग्रंथ में वीर और श्रृंगार दो ही रस है इस ग्रंथ की रचना प्रत्यक्षदर्शी की भांति की है लेकिन शिलालेख प्रमाण से यह स्पष्ट होता है कि इस रचना को पूर्ण करने वाला कोई अज्ञात कवि है जो चंद और पृथ्वीराज के अंतिम क्षण का वर्णन कर इस रचना को पूर्ण करता है

चंदबरदाई को हिंदी का पहला कवि और उनकी रचना पृथ्वीराज रासो को हिंदी की पहली रचना होने का सम्मान प्राप्त है शायद ही सी वजह से हिंदी के आदिकाल को ‘चारण काल’ भी कहा जाता है पृथ्वीराज रासो हिंदी का सबसे बड़ा काव्य ग्रंथ है इसमें 10,000 से अधिक ठंड है और तत्कालीन  प्रचलित 6 भाषाओं का प्रयोग किया गया है इस ग्रंथ में उत्तर भारतीय क्षेत्रीय समाज व उनकी परंपराओं के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है इस कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका बहुत महत्व है 

 पृथ्वीराज रासो जितना प्रसिद्ध है उतना ही विवादी भी है अनेक देशी और विदेशी विद्वानों ने इस ग्रंथ के संबंध में शोध किए हैं और इसकी प्रमाणिकता तथा अप्रमाणिकता पर अपने विचार व्यक्त किए हैं आरंभ में यह ग्रंथ विवाद से नहीं था ‘गार्सा द तासी’ को भी इस पर कोई संदेह नहीं था और शुरुआत में ‘जॉर्ज क्रिएशन’ भी इसे प्रमाणित ही मानते थे पृथ्वीराज रासो की प्रसिद्धि को भारत से यूरोप तक पहुंचाने का श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को है

इन्होंने इस ग्रंथ की वर्णन शैली तथा काव्य सौंदर्य पर इसके 1 बड़े भाग का अंग्रेजी में अनुवाद किया और इस वीर काव्य के आधार पर अपना राजस्थान नामक विख्यात इतिहास ग्रंथ लिखा लगभग इसी समय जोधपुर के मुरारी दान चारण और उदयपुर के कविराज श्यामल दास ने रासो की ऐतिहासिकता पर शंका प्रकट की इसी बीच प्रोफ़ेसर वूलर को अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान 1875 में “जयानक” नामक कवि द्वारा 12सरगो में रचित संस्कृत महाकाव्य ‘पृथ्वीराज विजय’ की एक आधी अधूरी प्रति मिली इस क्रम में दिए गए तथ्य ऐतिहासिक रूप से सही पाए गए और इसकी तुलना में प्रोफ़ेसर बूलर को पृथ्वीराज रासो और उसके रचयिता चंदबरदाई की ऐतिहासिकता और वास्तविकता पर संदेह हुआ

उन्होंने पत्र लिखकर एशियाटिक सोसायटी द्वारा किया जा रहा रासो का प्रकाशन रुकवा दिया इस प्रकाशन के टाल दिए जाने पर नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने इस कार्य को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया और सन 1905 में मोहनलाल, विष्णु लाल पंडा, बाबा राधा कृष्ण दास ,कुंवर कन्हैया और बाबू श्यामसुंदर दास द्वारा रासो का संपादन करवा कर दो भागों में प्रकाशित किया इसके प्रकाशन के बाद चंद और ‘पृथ्वीराज रासो ‘की प्रमाणिकता के पक्ष और विरोध में अनेक विद्वानों तथा शोधकर्ताओं के तर्क वितरक जोर पकड़ने लगे और विवाद बढ़ता चला गया | चंदबरदाई का जीवन परिचय |

चंदबरदाई का रचनाकाल

 इन्हें जालंधरी देवी का इष्ट था जिसकी कृपया से यह दृष्ट काव्य भी कर सकते थेपृथ्वीराज ने 1165 से 1192 तक अजमेर में दिल्ली पर राज किया यही चंदबरदाई का रचनाकाल भी था इनका जीवन पृथ्वीराज के जीवन के साथ ऐसा मिलाजुला था कि अलग नहीं किया जा सकता जब मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान को परास्त करके उन्हें बंदी बनाकर “गजनी” लेकर गया तब चंदबरदाई अपने आप को रोक नहीं सके और वह भी पृथ्वीराज चौहान के साथ गजनी चले गए

जब खेत में बंद पृथ्वीराज को अंधा कर दिया गया तब चंदबरदाई को उनकी यह अवस्था देखी नहीं गई और उन्होंने मोहम्मद गौरी को मारने का षड्यंत्र रचा योजना के अंतर्गत इन्होंने पहले तो  मोहम्मद गौरी का हृदय जीता और फिर उन्हें बताया कि पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण चला सकते हैं इससे प्रभावित होकर मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज की इस कला को देखने की इच्छा प्रकट की प्रदर्शन के दिन चंदबरदाई गोरी के साथ ही मंच पर बैठे

अंधे पृथ्वीराज को मैदान में लाया गया एवं उनसे अपनी कला का प्रदर्शन करने को कहा गया पृथ्वीराज के द्वारा जैसे ही एक घंटे के ऊपर बाण चलाया गया तो उनकी कला को देखकर मोहम्मद गोरी हैरान रह गया इसके बाद चंदबरदाई ने एक दोहे में पृथ्वीराज को यह बता दिया कि गोरी कहां पर एवं कितनी ऊंचाई पर बैठा हुआ है वह दोहा इस प्रकार था –

चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमान, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान इस प्रकार चंदबरदाई की सहायता से पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी का वध किया था 

चंदबरदाई की मृत्यु 

पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई का जन्म एक ही दिन हुआ था और दोनों ने एक ही दिन संसार को छोड़ा था 1192 ईस्वी को गजनी में इन दोनों की मृत्यु हुई थी 

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